राम अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् || Sri Ram Ashtottara Shatanama Stotram

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राम अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् || Sri Ram Ashtottara Shatanama Stotram

श्री राम अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्रम् में भगवान श्री राम जी के 108 नामों का वर्णन हैं ! श्री राम अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्रम् का नियमित रूप से पाठ करने से जातक के यंहा लक्ष्मी जी का स्थिर वास होता हैं ! साधक की समस्त मनोकामना पूर्ण होती हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500 Sri Ram Ashtottara Shatanama Stotram By Acharya Pandit Lalit Trivedi

राम अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् || Sri Ram Ashtottara Shatanama Stotram

॥ अथ श्रीमदानन्दरामायणान्तर्गत श्री रामाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥

विष्णुदास उवाच-

ॐ अस्य श्रीरामचन्द्रनामाष्टोत्तरशतमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः ।

अनुष्टुप् छन्दः । जानकीवल्लभः श्रीरामचन्द्रो देवता ॥

ॐ बीजम् । नमः शक्तिः । श्रीरामचन्द्रः कीलकम् ।

श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥

अङ्गुलीन्यासः ।

ॐ नमो भगवते राजाधिराजाय परमात्मने अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।

ॐ नमो भगवते विद्याधिराजाय हयग्रीवाय तर्जनीभ्यां नमः ।

ॐ नमो भगवते जानकीवल्लभाय मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ नमो भगवते रघुनन्दनायामिततेजसे अनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ नमो भगवते क्षीराब्धिमध्यस्थाय नारायणाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

ॐ नमो भगवते सत्प्रकाशाय रामाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

षडङ्गन्यासः ।

ॐ नमो भगवते राजाधिराजाय परमात्मने हृदयाय नमः ।

ॐ नमो भगवते विद्याधिराजाय हयग्रीवाय शिरसे स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते जानकीवल्लभाय शिखायै वषट् ।

ॐ नमो भगवते रघुनन्दनायामिततेजसे कवचाय हुम् ।

ॐ नमो भगवते क्षीराब्धिमध्यस्थाय नारायणाय नेत्रत्रयाय वौषट् ।

ॐ नमो भगवते सत्प्रकाशाय रामाय अस्त्राय फट् । इति दिग्बन्धः ॥

अथ ध्यानम् ।

मन्दाराकृतिपुण्यधामविलसद्वक्षस्थलं कोमलं,

शान्तं कान्तमहेन्द्रनीलरुचिराभासं सहस्राननम् ।

वन्देऽहं रघुनन्दनं सुरपतिं कोदण्डदीक्षागुरुं,

रामं सर्वजगत्सुसेवितपदं सीतामनोवल्लभम् ॥ १६॥

अथ स्तोत्रम् ।

सहस्रशीर्ष्णे वै तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः ।

नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च ॥ १७॥

नमो जीमूतवर्णाय नमस्ते विश्वतोमुख ।

अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शेषशायिने ॥ १८॥

नमो हिरण्यगर्भाय पञ्चभूतात्मने नमः ।

नमो मूलप्रकृतये देवानां हितकारिणे ॥ १९॥

नमस्ते सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन ।

शङ्खचक्रगदापद्मजटामुकुटधारिणे ॥ २०॥

नमो गर्भाय तत्त्वाय ज्योतिषां ज्योतिषे नमः ।

ॐ नमो वासुदेवाय नमो दशरथात्मज ॥ २१॥

नमो नमस्ते राजेन्द्र सर्वसम्पत्प्रदाय च ।

नमः कारुण्यरूपाय कैकेयीप्रियकारिणे ॥ २२॥

नमो दन्ताय शान्ताय विश्वामित्रप्रियाय ते ।

यज्ञेशाय नमस्तुभ्यं नमस्ते क्रतुपालक ॥ २३॥

नमो नमः केशवाय नमो नाथाय शर्ङ्गिणे ।

नमस्ते रामचन्द्राय नमो नारायणाय च ॥ २४॥

नमस्ते रामचन्द्राय माधवाय नमो नमः ।

गोविन्द्राय नमस्तुभ्यं नमस्ते परमात्मने ॥ २५॥

नमस्ते विष्णुरूपाय रघुनाथाय ते नमः ।

नमस्तेऽनाथनाथाय नमस्ते मधुसूदन ॥ २६॥

त्रिविक्रम नमस्तेऽस्तु सीतायाः पतये नमः ।

वामनाय नमस्तुभ्यं नमस्ते राघवाय च ॥ २७॥

नमो नमः श्रीधराय जानकीवल्लभाय च ।

नमस्तेऽस्तु हृषीकेश कन्दर्पाय नमो नमः ॥ २८॥

नमस्ते पद्मनाभाय कौसल्याहर्षकारिणे ।

नमो राजीवनेत्राय नमस्ते लक्ष्मणाग्रज ॥ २९॥

नमो नमस्ते काकुत्स्थ नमो दामोदराय च ।

विभीषणपरित्रातर्नमः सङ्कर्षणाय च ॥ ३०॥

वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते शङ्करप्रिय ।

प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः ॥ ३१॥

सदसद्भक्तिरूपाय नमस्ते पुरुषोत्तम ।

अधोक्षज नमस्तेऽस्तु सप्ततालहराय च ॥ ३२॥

खरदूषणसंहर्त्रे श्रीनृसिम्हाय ते नमः ।

अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते सेतुबन्धक ॥ ३३॥

जनार्दन नमस्तेऽस्तु नमो हनुमदाश्रय ।

उपेन्द्रचन्द्रवन्द्याय मारीचमथनाय च ॥ ३४॥

नमो बालिप्रहरण नमः सुग्रीवराज्यद ।

जामदग्न्यमहादर्पहराय हरये नमः ॥ ३५॥

नमो नमस्ते कृष्णाय नमस्ते भरताग्रज ।

नमस्ते पितृभक्ताय नमः शत्रुघ्नपूर्वज ॥ ३६॥

अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः शत्रुघ्नसेवित ।

नमो नित्याय सत्याय बुद्ध्यादिज्ञानरूपिणे ॥ ३७॥

अद्वैतब्रह्मरूपाय ज्ञानगम्याय ते नमः ।

नमः पूर्णाय रम्याय माधवाय चिदात्मने ॥ ३८॥

अयोध्येशाय श्रेष्ठाय चिन्मात्राय परात्मने ।

नमोऽहल्योद्धारणाय नमस्ते चापभञ्जिने ॥ ३९॥

सीतारामाय सेव्याय स्तुत्याय परमेष्ठिने ।

नमस्ते बाणहस्ताय नमः कोदण्डधारिणे ॥ ४०॥

नमः कबन्धहन्त्रे च वालिहन्त्रे नमोऽस्तु ते ।

नमस्तेऽस्तु दशग्रीवप्राणसंहारकारिणे ॥ ४१॥

अष्टोत्तरशतं नाम्नां रमचन्द्रस्य पावनम् ।

एतत्प्रोक्तं मया श्रेष्ठ सर्वपातकनाशनम् ॥ ४२॥

प्रचरिष्यति तल्लोके प्राण्यदृष्टवशाद्द्विज ।

तस्य कीर्तनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ ४३॥

तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरःसरम्।

यावन्नामाष्टकशतं पुरुषो न हि कीर्तयेत् ॥ ४४॥

तावत्कलेर्महोत्साहो निःशङ्कं सम्प्रवर्तते ।

यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्तनम् ॥ ४६॥

तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं प्राणिनां स्फुटम् ।

यावन्न निष्ठया रामनाममाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४७॥

कीर्तितं पठितं चित्ते धृतं संस्मारितं मुदा ।

अन्यतः शृणुयान्मर्त्यः सोऽपि मुच्येत पातकात् ॥ ४८॥

ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति ।

रामस्तोत्रं मासमेकं पठित्वा मुच्यते नरः ॥ ४९॥

दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् ।

पापं सकृत्कीर्तनेन रामस्तोत्रं विनाशयेत् ॥ ५०॥

श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।

अर्हन्ति नाल्पां श्रीरामनामकीर्तिकलामपि ॥ ५१॥

अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतारामस्य पावनम् ।

अस्य सङ्कीर्तनादेव सर्वान् कामान् लभेन्नरः ॥ ५२॥

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी धनमाप्नुयात् ।

स्त्रियं प्राप्नोति पत्न्यर्थी स्तोत्रपाठश्रवादिना ॥ ५३॥

कुम्भोदरेण मुनिना येन स्तोत्रेण राघवः ।

स्तुतः पूर्वं यज्ञवाटे तदेतत्त्वां मयोदितम् ॥ ५४॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥

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