श्री सूर्याष्टकम् ( Shri Suryashtakam ) Shri Surya Ashtakam

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श्री सूर्याष्टकम् || Shri Suryashtakam

श्री सूर्याष्टकम् श्री पण्डित रघुनाथ शर्मा द्वारा रचियत हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500 Shri Suryashtakam By Acharya Pandit Lalit Trivedi

श्री सूर्याष्टकम् || Shri Suryashtakam

॥ सूर्याष्टकम् ॥

श्रीगणेशाय नमः ।

प्रभाते यस्मिन्नभ्युदितसमये कर्मसु नृणां,

प्रवर्तेद्वै चेतो गतिरपि च शीतापहरणम् ।

गतो मैत्र्यं पृथ्वीसुरकुलपतेर्यश्च तमहं,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ १॥

त्रिनेत्रोऽप्यञ्जल्या सुरमुकुटसंवृष्टचरणे,

बलिं नीत्वा नित्यं स्तुतिमुदितकालास्तसमये ।

निधानं यस्यायं कुरुत इति धाम्नामधिपति,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ २॥

मृगाङ्के मूर्तित्वं ह्यमरगण भर्ताकृत इति,

नृणां वर्त्मात्मात्मोक्षिणितविदुषां यश्च यजताम् ।

क्रतुर्लोकानां यो लयभरभवेषुप्रभुरयं,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ३॥

दिशः खं कालो भूरुदधिरचलं चाक्षुषमिदं,

विभागो येनायं निखिलमहसा दीपयति तान् ।

स्वयं शुद्धं संविन्निरतिशयमानन्दमजरं,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ४॥

वृषात्पञ्चस्वेत्यौढयति दिनमानन्दगमनस्-,

तथा वृद्धिं रात्रैः प्रकटयति कीटाज्जवगतिः ।

तुले मेषे यातो रचयति समानं दिननिशं,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ५॥

वहन्ते यं ह्यश्वा अरुणविनि युक्ताः प्रमुदितास्-,

त्रयीरूपं साक्षाद्दधति च रथं मुक्तिसदनम् ।

नजीवानां यं वै विषयति मनो वागवसरो,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ६॥

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तथा ब्रह्मा नित्यं मुनिजनयुता यस्य पुरतश्-,

चलन्ते नृत्यन्तोऽयुतमुत रसेनानुगुणितं ।

निबध्नन्ती नागा रथमपि च नागायुतबला ,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ७॥

प्रभाते ब्रह्माणं शिवतनुभृतं मध्यदिवसे,

तथा सायं विष्णुं जगति हितकारी सुखकरम् ।

सदा तेजोराशिं त्रिविवमथ पापौघशमनं,

नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ८॥

मतं शास्त्राणां यत्तदनु रघुनाथेन रचितं,

शुभं चुंराग्रामे तिमिरहरसूर्याष्टकमिदम् ।

त्रिसन्ध्यायां नित्यं पठति मनुजोऽनन्यगतिमांश्-,

चतुर्वर्गप्राप्तौ प्रभवति सदा तस्य विजयम् ॥ ९॥

नन्देन्द्वङ्क्क्षितावब्दे मार्गमासे शुभे दले ।

सूर्याष्टकमिदं प्रोक्तं दशम्यां रविवासरे ॥ १०॥

इति श्रीपण्डितरघुनाथशर्मणा विरचितं श्रीसूर्याष्टकं सम्पूर्णम् ।

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