श्री काली अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् || Shri Kali Ashtottara Shatanama Stotram

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श्री काली अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् || Shri Kali Ashtottara Shatanama Stotram

Shri Kali Ashtottara Shatanama Stotram का जो नियमित रूप से प्रातः मध्याह्न, सायं तथा रात्रि में सदैव पाठ करता है, उसके घर में माँ काली का वास होता है। और उस साधक को जल, अग्नि, श्मशान, युद्धस्थल में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता नही रहता हैं ! श्री काली अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् बृहन्नीलतन्त्रार्गतम् से लिया गया हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500 Shri Kali Ashtottara Shatanama Stotram By Acharya Pandit Lalit Trivedi

श्री काली अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् || Shri Kali Ashtottara Shatanama Stotram

श्रीदेव्युवाच ।

पुरा प्रतिश्रुतं देव क्रीडासक्तो यदा भवान् ।

नाम्नां शतं महाकाल्याः कथयस्व मयि प्रभो ॥ २३-१॥

श्रीभैरव उवाच ।

साधु पृष्टं महादेवि अकथ्यं कथयामि ते ।

न प्रकाश्यं वरारोहे स्वयोनिरिव सुन्दरि ॥ २३-२॥

प्राणाधिकप्रियतरा भवती मम मोहिनी ।

क्षणमात्रं न जीवामि त्वां बिना परमेश्वरि ॥ २३-३॥

यथादर्शेऽमले बिम्बं घृतं दध्यादिसंयुतम् ।

तथाहं जगतामाद्ये त्वयि सर्वत्र गोचरः ॥ २३-४॥

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि जपात् सार्वज्ञदायकम् ।

सदाशिव ऋषिः प्रोक्तोऽनुष्टुप् छन्दश्च ईरितः ॥ २३-५॥

देवता भैरवो देवि पुरुषार्थचतुष्टये ।

विनियोगः प्रयोक्तव्यः सर्वकर्मफलप्रदः ॥ २३-६॥

महाकाली जगद्धात्री जगन्माता जगन्मयी ।

जगदम्बा गजत्सारा जगदानन्दकारिणी ॥ २३-७॥

जगद्विध्वंसिनी गौरी दुःखदारिद्र्यनाशिनी ।

भैरवभाविनी भावानन्ता सारस्वतप्रदा ॥ २३-८॥

चतुर्वर्गप्रदा साध्वी सर्वमङ्गलमङ्गला ।

भद्रकाली विशालाक्षी कामदात्री कलात्मिका ॥ २३-९॥

नीलवाणी महागौरसर्वाङ्गा सुन्दरी परा ।

सर्वसम्पत्प्रदा भीमनादिनी वरवर्णिनी ॥ २३-१०॥

वरारोहा शिवरुहा महिषासुरघातिनी ।

शिवपूज्या शिवप्रीता दानवेन्द्रप्रपूजिता ॥ २३-११॥

सर्वविद्यामयी शर्वसर्वाभीष्टफलप्रदा ।

कोमलाङ्गी विधात्री च विधातृवरदायिनी ॥ २३-१२॥

पूर्णेन्दुवदना नीलमेघवर्णा कपालिनी ।

कुरुकुल्ला विप्रचित्ता कान्तचित्ता मदोन्मदा ॥ २३-१३॥

मत्ताङ्गी मदनप्रीता मदाघूर्णितलोचना ।

मदोत्तीर्णा खर्परासिनरमुण्डविलासिनी ॥ २३-१४॥

नरमुण्डस्रजा देवी खड्गहस्ता भयानका ।

अट्टहासयुता पद्मा पद्मरागोपशोभिता ॥ २३-१५॥

वराभयप्रदा काली कालरात्रिस्वरूपिणी ।

स्वधा स्वाहा वषट्कारा शरदिन्दुसमप्रभा ॥ २३-१६॥

शरत्ज्योत्स्ना च संह्लादा विपरीतरतातुरा ।

मुक्तकेशी छिन्नजटा जटाजूटविलासिनी ॥ २३-१७॥

सर्पराजयुताभीमा सर्पराजोपरि स्थिता ।

श्मशानस्था महानन्दिस्तुता संदीप्तलोचना ॥ २३-१८॥

शवासनरता नन्दा सिद्धचारणसेविता ।

बलिदानप्रिया गर्भा भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ॥ २३-१९॥

गायत्री चैव सावित्री महानीलसरस्वती ।

लक्ष्मीर्लक्षणसंयुक्ता सर्वलक्षणलक्षिता ॥ २३-२०॥

व्याघ्रचर्मावृता मेध्या त्रिवलीवलयाञ्चिता ।

गन्धर्वैः संस्तुता सा हि तथा चेन्दा महापरा ॥ २३-२१॥

पवित्रा परमा माया महामाया महोदया ।

इति ते कथितं दिव्यं शतं नाम्नां महेश्वरि ॥ २३-२२॥

यः पठेत् प्रातरुत्थाय स तु विद्यानिधिर्भवेत् ।

इह लोके सुखं भुक्त्वा देवीसायुज्यमाप्नुयात् ॥ २३-२३॥

तस्य वश्या भवन्त्येते सिद्धौघाः सचराचराः ।

खेचरा भूचराश्चैव तथा स्वर्गचराश्च ये ॥ २३-२४॥

ते सर्वे वशमायान्ति साधकस्य हि नान्यथा ।

नाम्नां वरं महेशानि परित्यज्य सहस्रकम् ॥ २३-२५॥

पठितव्यं शतं देवि चतुर्वर्गफलप्रदम् ।

अज्ञात्वा परमेशानि नाम्नां शतं महेश्वरि ॥ २३-२६॥

भजते यो महकालीं सिद्धिर्नास्ति कलौ युगे ।

प्रपठेत् प्रयतो भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २३-२७॥

लक्षवर्षसहस्रस्य कालीपूजाफलं भवेत् ।

बहुना किमिहोक्तेन वाञ्छितार्थी भविष्यति ॥ २३-२८॥

इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे भैरवपार्वतीसंवादे कालीशतनामनिरूपणं त्रयोविंशः पटलः ॥ २३॥

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