माता कालरात्रि देवी की पूजा विधि || Mata Kaalratri Devi Ki Puja Vidhi

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माता कालरात्रि देवी की पूजा विधि || Mata Kaalratri Devi Ki Puja Vidhi

नवरात्री की सप्तमी तिथि को आदिशक्ति दुर्गा रूप की आराधना की जाती है ! इनका रंग अमावस्या रात की तरह काला होने के कारण ही इन्हें कालरात्रि कहते हैं । !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! जय श्री मेरे पूज्यनीय माता – पिता जी !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें Mobile & Whats app Number : 7821878500 Mata Kaalratri Devi Ki Puja Vidhi By Acharya Pandit Lalit Trivedi

माता कालरात्रि देवी की पूजा विधि || Mata Kaalratri Devi Ki Puja Vidhi

माता कालरात्रि देवी का स्वरूप || Mata Kaalratri Devi Ka Swarup

असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अपने तेज से इन्हें उत्पन्न किया था। ये शरणागतों को सदैव शुभ फल देनेवाली मानी जाती है, जिस कारण माता को शुभंकरी भी कहा जाता है | अन्धकार का नाश कर प्रकाश प्रदान करने वाली Mata Kaalratri की पूजा होती है |

भय का विनाश करने वाली और काल से अपने भक्तों की रक्षा करने वाली मां कालरात्रि का स्वरुप बड़ा ही भयानक है,  नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड के समान सदृश्य गोल है | गले में विद्युत् की तरह चमकने वाली माला है | इनकी नासिका से अग्नि की भयंकर ज्वाला निकलती रहती है. इनके बाल बिखरे हुए हैं तथा इनके गले में विधुत की माला है। इनके चार हाथ है जिसमें इन्होंने एक हाथ में कटार तथा एक हाथ में लोहे कांटा धारण किया हुआ है। इसके अलावा इनके दो हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है। इनके तीन नेत्र है तथा इनके श्वास से अग्नि निकलती है। कालरात्रि का वाहन गर्दभ (गधा) है। नवरात्रि में सप्तमी की पूजा का बड़ा महत्व होता है क्योंकि देवी का यह रूप सिद्धि प्रदान करने वाला है | यह दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है | 

शास्त्रानुसार इस दिन पहले कलश की पूजा करनी चाहिए, फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, माता के परिवार में उपस्थित देवी-देवताओं और फिर माता कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए |

माता कालरात्रि देवी की कथा || Mata Kaalratri Devi Ki Katha

कथा के अनुसार दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए। शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा। शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। परंतु जैसे ही दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए। इसे देख दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद जब दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया । इससे भक्तों को मनोवांछित फल मिलता है |

माता कालरात्रि देवी की पूजा विधि || Mata Kaalratri Devi Ki Puja Vidhi

सप्तमी तिथि के दिन भगवती की पूजा में गुड़ का नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मण को दे देना चाहिए। ऐसा करने से पुरुष शोकमुक्त हो सकता है। मान्यता है कि Mata Kaalratri की पूजा करने से मनुष्य समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है । Mata Kaalratri पराशक्तियों (काला जादू) की साधना करने वाले जातकों के बीच बेहद प्रसिद्ध हैं। मां की भक्ति से दुष्टों का नाश होता है और ग्रह बाधाएं दूर हो जाती हैं। 

माता कालरात्रि देवी का मंत्र || Mata Kaalratri Devi Ka Mantra

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी । 

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥

माता कालरात्रि देवी के उपाय || Mata Kaalratri Devi Ka Upay

सप्तमी तिथि को Mata Kaalratri देवी को गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाने और दान करने से दरिद्रता समाप्त हो जाती है !

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