महाकाली कवच ( Mahakali Kavacham ) Mahakali Kavacham Lyrics

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महाकाली कवच || Mahakali Kavacham

जो भी साधक काली कवच का नित्य रोज़ाना जाप करने से भोग व मोक्ष प्रदायक, मोहिनी शक्ति देने वाला, अघों (पापों) का नाश करने वाला, शत्रु विजय दिलाने वाला अद्‌भुत कवच है । श्री जगन्मंगल कवचम् का रोजाना जाप करने से साधक के अन्दर तेज़ उत्पन्न होता हैं ! उसके अन्दर वशीभूत करने वाली उर्जा आ जाती हैं ! श्री जगन्मंगल कवचम् माँ काली को अति प्रिय है !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! जय श्री मेरे पूज्यनीय माता – पिता जी !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें Mobile & Whats app Number : 9667189678 Mahakali Kavacham By Acharya Pandit Lalit Trivedi

महाकाली कवच || Mahakali Kavacham

|| भैरव्युवाच ||

काली पूजा श्रुता नाथ भावाश्च विविधाः प्रभो ।

इदानीं श्रोतु मिच्छामि कवचं पूर्व सूचितम् ॥

त्वमेव शरणं नाथ त्राहि माम् दुःख संकटात् ।

सर्व दुःख प्रशमनं सर्व पाप प्रणाशनम् ॥

सर्व सिद्धि प्रदं पुण्यं कवचं परमाद्भुतम् ।

अतो वै श्रोतुमिच्छामि वद मे करुणानिधे ॥

|| भैरवोवाच ||

रहस्यं श्रृणु वक्ष्यामि भैरवि प्राण वल्लभे ।

श्री जगन्मङ्गलं नाम कवचं मंत्र विग्रहम् ॥

पाठयित्वा धारयित्वा त्रौलोक्यं मोहयेत्क्षणात् ।

नारायणोऽपि यद्धत्वा नारी भूत्वा महेश्वरम् ॥

योगिनं क्षोभमनयत् यद्धृत्वा च रघूद्वहः ।

वरदीप्तां जघानैव रावणादि निशाचरान् ॥

यस्य प्रसादादीशोऽपि त्रैलोक्य विजयी प्रभुः ।

धनाधिपः कुबेरोऽपि सुरेशोऽभूच्छचीपतिः ।

एवं च सकला देवाः सर्वसिद्धिश्वराः प्रिये ॥

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|| विनियोग ||

ॐ श्री जगन्मङ्गलस्याय कवचस्य ऋषिः शिवः ।

छ्न्दोऽनुष्टुप् देवता च कालिका दक्षिणेरिता ॥

जगतां मोहने दुष्ट विजये भुक्तिमुक्तिषु ।

यो विदाकर्षणे चैव विनियोगः प्रकीर्तितः ॥

|| अथ कवचम् ||

शिरो मे कालिकां पातु क्रींकारैकाक्षरीपर ।

क्रीं क्रीं क्रीं मे ललाटं च कालिका खड्‌गधारिणी ॥

हूं हूं पातु नेत्रयुग्मं ह्नीं ह्नीं पातु श्रुति द्वयम् ।

दक्षिणे कालिके पातु घ्राणयुग्मं महेश्वरि ॥

क्रीं क्रीं क्रीं रसनां पातु हूं हूं पातु कपोलकम् ।

वदनं सकलं पातु ह्णीं ह्नीं स्वाहा स्वरूपिणी ॥

द्वाविंशत्यक्षरी स्कन्धौ महाविद्यासुखप्रदा ।

खड्‌गमुण्डधरा काली सर्वाङ्गभितोऽवतु ॥

क्रीं हूं ह्नीं त्र्यक्षरी पातु चामुण्डा ह्रदयं मम ।

ऐं हूं ऊं ऐं स्तन द्वन्द्वं ह्नीं फट् स्वाहा ककुत्स्थलम् ॥

अष्टाक्षरी महाविद्या भुजौ पातु सकर्तुका ।

क्रीं क्रीं हूं हूं ह्नीं ह्नीं पातु करौ षडक्षरी मम ॥

क्रीं नाभिं मध्यदेशं च दक्षिणे कालिकेऽवतु ।

क्रीं स्वाहा पातु पृष्ठं च कालिका सा दशाक्षरी ॥

क्रीं मे गुह्नं सदा पातु कालिकायै नमस्ततः ।

सप्ताक्षरी महाविद्या सर्वतंत्रेषु गोपिता ॥

ह्नीं ह्नीं दक्षिणे कालिके हूं हूं पातु कटिद्वयम् ।

काली दशाक्षरी विद्या स्वाहान्ता चोरुयुग्मकम् ॥

ॐ ह्नीं क्रींमे स्वाहा पातु जानुनी कालिका सदा ।

काली ह्रन्नामविधेयं चतुवर्ग फलप्रदा ॥

क्रीं ह्नीं ह्नीं पातु सा गुल्फं दक्षिणे कालिकेऽवतु ।

क्रीं हूं ह्नीं स्वाहा पदं पातु चतुर्दशाक्षरी मम ॥

खड्‌गमुण्डधरा काली वरदाभयधारिणी ।

विद्याभिः सकलाभिः सा सर्वाङ्गमभितोऽवतु ॥

काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी ।

विपचित्ता तथोग्रोग्रप्रभा दीप्ता घनत्विषः ॥

नीला घना वलाका च मात्रा मुद्रा मिता च माम् ।

एताः सर्वाः खड्‌गधरा मुण्डमाला विभूषणाः ॥

रक्षन्तु मां दिग्निदिक्षु ब्राह्मी नारायणी तथा ।

माहेश्वरी च चामुण्डा कौमारी चापराजिता ॥

वाराही नारसिंही च सर्वाश्रयऽति भूषणाः ।

रक्षन्तु स्वायुधेर्दिक्षुः दशकं मां यथा तथा ॥

|| प्रतिफलम् ||

इति ते कथित दिव्य कवचं परमाद्भुतम् ।

श्री जगन्मङ्गलं नाम महामंत्रौघ विग्रहम् ॥

त्रैलोक्याकर्षणं ब्रह्मकवचं मन्मुखोदितम् ।

गुरु पूजां विधायाथ विधिवत्प्रपठेत्ततः ॥

कवचं त्रिःसकृद्वापि यावज्ज्ञानं च वा पुनः ।

एतच्छतार्धमावृत्य त्रैलोक्य विजयी भवेत् ॥

त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव कवचस्य प्रसादतः ।

महाकविर्भवेन्मासात् सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥

पुष्पाञ्जलीन् कालिका यै मुलेनैव पठेत्सकृत् ।

शतवर्ष सहस्त्राणाम पूजायाः फलमाप्नुयात् ॥

भूर्जे विलिखितं चैतत् स्वर्णस्थं धारयेद्यदि ।

शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा धारणाद् बुधः ॥

त्रैलोक्यं मोहयेत्क्रोधात् त्रैलोक्यं चूर्णयेत्क्षणात् ।

पुत्रवान् धनवान् श्रीमान् नानाविद्या निधिर्भवेत् ॥

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ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद् गात्र स्पर्शवात्ततः ।

नाशमायान्ति सर्वत्र कवचस्यास्य कीर्तनात् ॥

मृतवत्सा च या नारी वन्ध्या वा मृतपुत्रिणी ।

कण्ठे वा वामबाहौ वा कवचस्यास्य धारणात् ॥

वह्वपत्या जीववत्सा भवत्येव न संशयः ।

न देयं परशिष्येभ्यो ह्यभक्तेभ्यो विशेषतः ॥

शिष्येभ्यो भक्तियुक्तेभ्यो ह्यन्यथा मृत्युमाप्नुयात् ।

स्पर्शामुद्‌धूय कमला वाग्देवी मन्दिरे मुखे ।

पौत्रान्तं स्थैर्यमास्थाय निवसत्येव निश्चितम् ॥

इदं कवचं न ज्ञात्वा यो जपेद्दक्षकालिकाम् ।

शतलक्षं प्रजप्त्वापि तस्य विद्या न सिद्धयति ।

शस्त्रघातमाप्नोति सोऽचिरान्मृत्युमाप्नुयात् ॥

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