माँ तारा अष्टकम ( Maa Tara Ashtakam ) Tarashtakam Lyrics

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माँ तारा अष्टकम || Maa Tara Ashtakam

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माँ तारा अष्टकम || Maa Tara Ashtakam

मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसंपत्प्रदे,

प्रत्यालीढपदस्थिते शिवहृदि स्मेराननांभोरुहे।

फुल्लेन्दीवरलोचनत्रययुते कर्त्री कपालोत्पले,

खड्गञ्चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥१॥

वाचामीश्वरि भक्तकल्पलतिके सर्वाथसिद्धिप्रदे,

गद्यप्राकृतपद्यजातरचनासर्वस्वसिद्धिप्रदे।

नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारांनिधे,

सौभाग्यामृतवर्षणेनकृपया सिञ्च त्वमस्मादृशम्॥२॥

सर्वे गर्वसमूहपूरिततनो सर्पादिवेषोज्ज्वले,

व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते।

सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिमिलन्मुण्डद्वयीमूर्धज,

ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय ॥३॥

मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्धचन्द्रात्मिके,

हुंफट्कारमयी त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशाम्।

मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा परा,

वेदानाम् न हि गोचरा कथमपि प्राप्तां नु तामाश्रये ॥४॥

यत्पादांबुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतां,

तस्य स्त्री परमेश्वरि त्रिनयना ब्रह्मादिसाम्यात्मनः।

संसारांबुधिमज्जने पटुतनू देवेन्द्रमुख्यान् सुरान्,

मातस्त्वत्पदसेवने हि विमुखो यो मन्दधीः सेवते॥५॥

मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिण,

स्ते देवा जयसंगरे विजयिनो निश्शङ्कमङ्के गताः।

देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्धां वहन्तः परे,

तत्तुल्यं नियतं यथासुभिरमी नाशं व्रजन्ति स्वयम् ॥६॥

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त्वन्नामस्मरणात् पलायनपरा द्रष्टुं च शक्ता न ते,

भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षाश्च नागाधिपाः।

दैत्या दानवपुङ्गवाशच खचरा व्याघ्रादिका जन्तवो,

डाकिन्यः कुपितान्तकाश्च मनुजं मातः क्षणं भूतले ॥७॥

लक्ष्मीः सिद्धिगणाश्च पादुकमुखा सिद्धिस्तथा वारिणः,

स्तंभाश्चापि रणाङ्गणॆ गजघटा स्तंभस्तथा मोहनम्।

मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः,

कान्तिः कान्तमनोभवस्य भवति क्षुद्रोऽपि वाचस्पतिः ॥८॥

ताराष्टकमिदं रम्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः।

प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः॥९॥

लभते कवितां दिव्यां सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत् ।

लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्॥१०॥

कीर्तिं कान्तिं च नैरुज्यं सर्वेषां प्रियतां व्रजेत्।

विख्यातिं चापि लोकेषु प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥११॥

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