गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र ( Gajendra Moksha Stotram ) Gajendra Moksha Stotra

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गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र [ Gajendra Moksha Stotram & Gajendra Moksha Stotra ] 

Gajendra Moksha स्तोत्र का वर्णित महापुराण में मिल जायेगा ! Gajendra Moksha स्तोत्र का लाभ पाने के लिए व्यक्ति को गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ सूर्योदय से पूर्व स्नान करके और पूर्व दिशा में मुख करके करना चाहिए ! जिस भी व्यक्ति के कर्ज बहुत हो गया और उतरने का नाम नही ले रहा है तो उनके लिए Gajendra Moksha स्तोत्र बहुत लाभकारी रहता हैं !  जिस भी व्यक्ति को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है उनके लिए भी Gajendra Moksha स्तोत्र पाठ करना लाभकारी रहता हैं ! जो भी व्यक्ति किसी भी शुभ दिन में शुभ समय पर या स्वार्थ सिद्धि योग या अमृत सिद्धि योग में प्रातःकाल स्नान करके भगवान श्री विष्णु जी के सामने पूर्व मुखी होकर कुश के आसन पर बैठकर धूप-दीप आरती के उपरांत गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र-श्रीमद्भागवत का पाठ करके भगवान श्री विष्णु जी की आरती कर हवन आदि करने से व्यक्ति को कर्ज के तनाव से मुक्ति मिलती हैं. जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500 gajendra moksha stotram by acharya pandit lalit sharma 

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र ( Gajendra Moksha Stotram ) Gajendra Moksha Stotra

श्रीशुक उवाच

” एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो ह्रदि ।

जजाप परमं जाप्यं प्राक्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ ” १ ॥

गजेन्द्र उवाच

” ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।

पुरुषायादिबीजाय परेशायाभीधीमहि ॥ ” २ ॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।

योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्दे स्वयंभुवम् ॥ ३ ॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितम् ।

क्वचिद्विभांतं क्व च तत्तिरोहितम् ।।

अविद्धदृक् साक्ष्युभयम तदीक्षते ।।।

सआत्ममूलोऽवतु मां परात्पतरः ।। ४ ।।

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो ।

लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।।

तमस्तदा ऽ ऽ सीद् गहनं गभीरम् ।।।

यस्तस्य पारे ऽ भिविराजते विभुः ॥ ५ ॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुः ।

जन्तुः पुनः कोऽर्हति गंतुमीरितुम् ।।

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो ।।।

दुरत्ययानुक्रमणः स माऽवतु ॥ ६ ॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम् ।

विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः ।।

चरंत्यलोकव्रतमव्रणं वने ।।।

भूतात्मभूतः सुह्रदः स मे गतिः ॥ ७ ॥

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा ।

न नामरुपे गुणदोष एव वा ।।

तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः ।।।

स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८ ॥

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।

अरुपायोरुरुपाय नम आश्र्चर्य कर्मणे ॥ ९ ॥

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।

नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १० ॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्र्चिता ।

नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११ ॥

नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।

निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२ ॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।

पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३ ॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।

असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ १४ ॥

नमो नमस्तेऽखिल कारणाय ।

निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।।

सर्वागमाम्नायमहार्णवाय ।।।

नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ १५ ॥

गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय ।

तत्क्षोभ-विस्फूर्जितमानसाय ।।

नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम ।।।

स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६ ॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय ।

मुक्ताय भुरिकरुणाय नमोऽलयाय ।।

स्वांशेनसर्वतनुभृत्मनसि-प्रतीत- ।।।

-प्रत्यग् दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ १७ ॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैः ।

दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।।

मुक्तात्मभिः स्वह्रदये परिभाविताय ।।।

ज्ञानात्मने भगवते नमः ईश्र्वराय ॥ १८ ॥

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मांगलिक दोष निवारण || Mangal Dosha Nivaran

दी गई YouTube Video पर क्लिक करके मांगलिक दोष के उपाय || Manglik Dosh Ke Upay बहुत आसन तरीके से सुन ओर देख सकोगें !

यं धर्मकामार्थ-विमुक्तिकामाः ।

भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।।

किंत्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययम् ।।।

करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ १९ ॥

एकांतिनो यस्य न कंचनार्थम् ।

वांछन्ति ये वै भगवत् प्रपन्नाः ।।

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम् ।।।

गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥ २० ॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम् ।

अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।।

अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम् ।।।

अनंतमाद्यं परिपूर्णमिडे ॥ २१ ॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्र्चराचराः ।

नामरुपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ २२ ॥

यथार्चिषोऽग्ने सवितुर्गभस्तयोः ।

निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।।

तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो ।।।

बुद्धिर्मनः ख्रानि शरीरसर्गाः ॥ २३ ॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ ।

न स्त्री न षंढो न पुमान् न जन्तुः ।।

नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् ।।।

निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४ ॥

जिजी विषे नाहमियामुया किम् ।

अन्तर्बहिश्र्चावृतयेभयोन्या ।।

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवः ।।।

तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५ ॥

सोऽहं विश्र्वसृजं विश्र्वमविश्र्वं विश्र्ववेदसम् ।

विश्र्वात्मानमजंब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ २६ ॥

योगरंधितकर्माणो ह्रदि योग-विभाविते ।

योगिनो यं प्रपश्यति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७ ॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- ।

-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।।

प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये ।।।

कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ २८ ॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहं धिया हतम् ।

तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवंतमितोऽस्म्यहम् ॥ २९ ॥

श्रीशुक उवाच

एवं गजेन्द्र मुपवर्णितनिर्विशेषम् ।

ब्रह्मादयो विविधलिंग भिदाभिमानाः ।।

नैते यदोपससृपुनिंखिलात्मकत्वात् ।।।

तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३० ॥

तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः ।

स्तोत्रं निशम्य दिविजै सह संस्तुवद्भिः ।।

छंदोमयेन गरुडेन समुह्यमानः ।।।

चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ ३१ ॥

सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो ।

दृष्टवा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।।

उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रात् ।।।

नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ३२ ॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य ।

सग्राहमाशु सरसः कृपायोज्जहार ।।

ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रम् ।।।

संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ ३३ ॥

योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्र्चर्य रुपधृक् ।

मुक्तो देवलशापेन हुहु-गंधर्व सत्तमः ।।

सोऽनुकंपित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् ।।।

लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्त-किल्बिषः ॥ ३४ ॥

गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद् विमुक्तोऽज्ञानबंधनात् ।

प्राप्तो भगवतो रुपं पीतवासाश्र्चतुर्भुजः ।।

एवं विमोक्ष्य गजयुथपमब्जनाभः ।।।

स्तेनापि पार्षदगति गमितेन युक्तः ॥ ३५ ॥

गंधर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान-

कर्माभ्दुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥ ३६ ॥

॥ इति श्रीमद् भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे गजेंन्द्रमोक्षणे तृतीयोऽध्यायः ॥

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